सरयूपारीण ब्राह्मण अनुक्रम सरयूपारीण ब्राह्मण उत्पत्ति सरयूपारीण ब्राम्हणों कि वंशावली दिक्चालन सूची

ब्राह्मण


सरयू नदीऋग्वेदअश्वमेध यज्ञयोजनसरयूघाघरा नदीगोमती नदीवशिष्ठवामदेवजाबालिकन्नौजकान्यकुब्जराजा अजदेवराज इंद्रराजा दुष्यंतहेमकूट पर्वतपद्म पुराणकैलाश पर्वतछपरानारायणी नदीगोरखपुरब्रम्हपुत्रगण्डकी नदीघाघरामहाभारतशुक्ल यजुर्वेदगोरखपुरगोरखपुरगोरखपुरगोरखपुर




सरयूपारीण ब्राह्मण या सरवरिया ब्राह्मण या सरयूपारी ब्राह्मण सरयू नदी के पूर्वी तरफ बसे हुए ब्राह्मणों को कहा जाता है। ऋग्वेद में मुख्य रूप से तीन नदियों का उल्लेख ही है। इनमे सरस्वती, सिंधु और सरयू नदी का ज़िक्र है। कई लोगो का मानना है कि सरयूपारीण ब्राह्मण उन्ही मूल कान्य्कुब्ज ब्राह्मणों का दल है जिन्होने भारतीय सभ्यता की नीव पूर्वी उत्तर प्रदेश और उत्तरी बिहार में रखी। ये शुद्ध आर्यवंशी षट्कर्मा वेदपाठी आदिकालिक समूह है जो की आदिकाल से ही ब्राह्मण धर्म का अधिष्ठाता रहा है।




अनुक्रम





  • 1 सरयूपारीण ब्राह्मण उत्पत्ति

    • 1.1 भ्रांतियाँ


    • 1.2 उत्पत्ति



  • 2 सरयूपारीण ब्राम्हणों कि वंशावली

    • 2.1 सरयूपारीण ब्राम्हणों में प्राप्त गोत्र


    • 2.2 गौत्र में प्राप्त वंश





सरयूपारीण ब्राह्मण उत्पत्ति



भ्रांतियाँ


सरयूपारीण ब्राह्मण की उत्पत्ति एवं इसकी वंशावली को लेकर आठ पंडितो ने किताबे लिखी हैं परन्तु सभी ने जो तर्क दिए, उनमें विरोधाभाष दिखता हैं। उदाहरण के लिए
सन १९१४ में प्रयाग के पंडित भोलाराम अग्निहोत्री ने अपने किताब "सरयूपारीण ब्राह्मण द्वीजोत्पत्तिः" में सरयूपारीण ब्राह्मण की उत्पत्ति को लेकर कथा लिखी हैं उसके अनुसार-
जब श्री रामचन्द्र जी के अश्वमेध यज्ञ हेतु कान्यकुब्ज प्रदेश से १६ ब्राम्हणों को बुलाया गया, यज्ञ के संपन्न होने के बाद वे जब अपने प्रदेश वापस जाने लगे तो श्रीराम ने उनसे वही बस जाने की विनती की और अपने धनुष से एक बाण चलाया जो २५ योजन दूर सरयू और घाघरा नदी संगम में जा गिरा और इस पच्चीस योजन की भूमि उन्होंने ब्राम्हणों की दान में दे दी। शर (बाण) और वार (निशाना) किये जाने के कारण इस भूमि क्षेत्र को शरवार या सरवार कहा जाने लगा और वहाँ के रहने वाले ब्राम्हण सरवरिया कहलाने लगे।
अब इस कहानी पर गौर करे तो यह वाल्मीकि रामायण में वर्णित हैं कि गोमती नदी के किनारे यह यज्ञ संपन्न हुआ था। जिसमे वशिष्ठ, वामदेव और जाबालि आदि ऋषियों ने भाग लिया था। परन्तु सरयूपारीण ब्राम्हणों में वामदेव और जाबालि के ब्राम्हण नहीं मिलते। अत: इसे भ्रमपूर्ण ही माना जायेगा की सरयूपारीण ब्राम्हणों के पूर्वज इस यज्ञ में सम्मलित थे। इसके अलावा इसमें जो वार (निशाना) शब्द का उपयोग किया गया हैं, उसका किसी भी संस्कृत ग्रंथो में उल्लेख नहीं हैं।


अंग्रेज इतिहासकार सर एस एलियट के अपने एक लेख के अनुसार कन्नौज के रहने वाले कान्यकुब्ज की ही पांच शाखाओ में से एक सरयू के आस पास फैल गए। इसके अलावा अन्य अंग्रेज लेखकों सर जॉन वोम्स, डब्लू क्रूक के अनुसार कान्य और कुब्जा दो भाई थे जिनकी संताने ही आगे जाकर कान्यकुब्ज कहलाई। और इन्ही की एक शाखा राजा अज के समय सरयू नदी किनारे आ कर बस गए और सरवरिया ब्रम्हाण कहलाने लगे।
इस कहानी में भी कई मतभेद देखे जा सकते हैं। जैसे की वायु पुराण के भुवन विन्यास प्रसंग में ब्रम्हाजी के जन्म से लेकर ब्राम्हण तक के जन्म तक की कथा हैं। परन्तु राजा अज के समय में ब्राम्हणो के वहाँ आकर बसने या उनका शाखाओ में विरक्त होने का कोई सन्दर्भ नहीं हैं।



उत्पत्ति


पुराणों से पता चलता हैं कि देवगण हिमालय पर्वत (पामीर का पठार) के आस-पास रहा करते थे तथा उसी के निकट ही महानतम ऋषियों के आश्रम हुआ करते थे। चुकि पुराणों में हिमालय पर्वत श्रंखला को बहुत ही पवित्र माना गया हैं अतः ऋषियों का वहाँ रहना सम्भव लगता हैं। यदि पौराणिक संदर्भो की ओर देख जाए तो जब देवराज इंद्र की आतिथ्य स्वीकार कर अपने राजधानी को लौटते हुए राजा दुष्यंत ने ऋषियों के परम क्षेत्र हेमकूट पर्वत की ओर देखा था जिसका वर्णन पद्म पुराण में आया हैं :



दक्षिणे भारतं वर्ष उत्तरे लवणोदधेः। कुलादेव महाभाग तस्य सीमा हिमालयः।।
ततः किंपुरषं हेमकुटादध: स्थितम। हरि वर्ष ततो ज्ञेयं निवधोबधिरुच्यते।।



इसी प्रकार बाराह पुराण के एक प्रसंग में महर्षि पुलस्त्य, धर्मराज युधिष्ठिर से यात्रा के सन्दर्भ में बताते हैं की:



ततो गच्छेत राजेंद्र देविकं लोक विश्रुताम। प्रसूतिर्यत्र विप्राणां श्रूयते भारतषर्भ।।
देविकायास्तटे वीरनगरं नाम वैपुरम। समृदध्यातिरम्यान्च पुल्सत्येन निवेशितम।।



अर्थात- हे राजेन्द्र लोक विश्रुत देविका नदी को जाना चाहिए जहा ब्राम्हणों कि उत्पत्ति सुनी जाती है। देविका नदी के तट पर वीरनगर नामक सुन्दर पुरी है जो समृद्ध और सुन्दर हैं।


एक अन्य पुराण के सन्दर्भ से निश्चित होता हैं कि देविका नदी के किनारे हेमकूट नामक किम्पुरुष क्षेत्र में ऋषि-मुनि रहा करते थे।



"देविकायां सरय्वाचं भवेदाविकसरवौ"



अर्थात- देविका और सरयू क्षेत्र के रहने वाले आविक और सारव कहे जाते हैं।

अनुमान हैं, की सारव और अवार (तट) के संयोग से सारववार बना होगा, और फिर समय के साथ उच्चारण में सरवार बन गया होगा। इसी सरवार क्षेत्र के रहने वाले सरवरिया कहे जाने लगे होंगे।


इस सम्बन्ध में मत्स्य पुराण में निम्न सन्दर्भ मिलता हैं:



अयोध्यायां दक्षिणे यस्याः सरयूतटाः पुनः। सारवावार देशोयं तथा गौड़ः प्रकीर्तितः।।



अर्थात- अयोध्या के दक्षिण में सरयू नदी के तट पर सरवावार देश हैं उसी प्रकार गोंडा देश भी मानना चाहिए।


सरयू नदी कैलाश पर्वत से निकल कर विहार प्रदेश में छपरा नगर के समीप नारायणी नदी में मिल जाती हैं। देविका नदी गोरखपुर से ६० मील दूर हिमालय से निकल कर ब्रम्हपुत्र के साथ गण्डकी में मिलती हैं। गण्डकी नदी नेपाल की तराई से निकल कर सरवार क्षेत्र होता हुआ सरयू नदी में समाहित होता हैं। सरयू, घाघरा, देविका (देवहा) ये तीनो नदियाँ एक ही में मिल कर कही-कही प्रवाहित होती हैं। महाभारत में इसका उल्लेख हैं कि सरयू, घाघरा और देविका नदी हिमालय से निकलती हैं, तीनो नदियों का संगम पहाड़ में ही हो गया था। इसीलिए सरयू को कही घाघरा तो कही देविका कहा जाता हैं।


पुराणों के अनुसार यही ब्रम्ह क्षेत्र हैं, जहाँ पर ब्राम्हणों की उत्पत्ति हुई थी यथासमय ब्रम्ह देश से जो ब्राम्हण अन्य देश में गए, वे उस देश के नाम से अभिहित हुए। जो विंध्य के दक्षिण क्षेत्र में गए वे महाराष्ट्रीय, द्रविड़, कर्नाटक और गुर्जर ब्राम्हण के रूप में प्रतिष्ठित हुए। और जो विंध्य के उत्तर देशों में बसे, वे सारस्वत, कान्यकुब्ज, गोंड़, उत्कल, मैथिल ब्राम्हण के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
इस तरह दशविध ब्राम्हणों के प्रतिष्ठित हो जाने पर ब्रम्हदेश के निवासी ब्राम्हणों की पहचान के लिए उनकी सर्वार्य संज्ञा हो गई। वही आगे चल कर सर्वार्य, सरवरिया, सरयूपारीण आदि कहे जाने लगे।


अतः जो लोग सरयूपारीण ब्राम्हणों को कान्यकुब्ज की ही एक शाखा कहते हैं, यह एक भ्रांति मात्र हैं।


स्मृतियों में पंक्ति पावन ब्राम्हणों का उल्लेख मिलता हैं। पंक्ति पावन ब्राम्हण सर्यूपारिणो में ही होते हैं। जो आज भी पंतिहा या पंक्तिपावन के रूप में विद्द्मान हैं।



सरयूपारीण ब्राम्हणों कि वंशावली


वैसे तो भारतवर्ष में ऋषियों की संख्या बहुत रही हैं, पर मात्र ४९ ऋषि ही गोत्रकार हुए हैं। ऋषियों के शिष्य प्रवरकार माने जाते थे तथा उस ऋषियों के आश्रम में जो वेद, शाखा आदि पढाई जाती थी वही वेद, उपवेद शाखा सूत्र उस गोत्र की मानी जाने लगी, जो वर्तमान तक चलती आ रही हैं।
वर्तमान में सरयूपारीण ब्राम्हणों में ३, १३, १६ घर जो कहे जाते हैं उसके पीछे एक पौराणिक सन्दर्भ हैं जिसके अनुसार वेदो की रक्षा एवं उसे अगली पीढ़ी तक पहुंचने के लिए ऋषि गर्ग के आश्रम में शुक्ल यजुर्वेद के पठन-पाठन की प्रक्रिया आरंभ हुई। अतः ऋषि गर्ग को प्रथम गोत्रकार माना जाता हैं।
ऋषि गर्ग के बाद गौतम फिर शाण्डिल्य ऋषि के आश्रम में यजुर्वेद और सामवेद के अध्ययन की परम्परा आरम्भ हो गई। और फिर यही तीन आश्रम आगे चल कर प्रथम कोटि के गर्ग(शुक्ल), गौतम(मिश्रा) और शाण्डिल्य(तिवारी) माने जाने लगे।
उसके बाद १३ अन्य ऋषियों के आश्रमों में वेदो की अन्य शाखाओं का पठन-पाठन आरम्भ हो गया। जो आज १३ घर (आश्रम) माने जाते हैं। चुकि इन तरह ऋषियों के कोई क्रम नहीं मिलते हैं, अतः इन्हें एक ही श्रेणी में माना जाने लगा।
चुकि इन ऋषियों के आश्रमों में अथर्ववेद एवं धनुर्वेद आदि भी पढ़ाया जाता था जिसे उस समय श्रेयस्कर नहीं माना जाता था। अतः आध्यातिमक शिक्षा दे रहे गर्ग, गौतम और शाण्डिल्य ऋषि के श्रेणी में अन्य नहीं आ सके।



सरयूपारीण ब्राम्हणों में प्राप्त गोत्र



  1. गर्ग

  2. गौतम

  3. शाण्डिल्य (गर्दभीमुख एवं श्रीमुख )

  4. गार्ग्य

  5. परासर

  6. सावर्ण्य

  7. कश्यप

  8. भारद्धाज

  9. कौशिक

  10. भार्गव

  11. वत्स

  12. कात्यायन

  13. सांकृत

  14. वशिष्ठ

  15. गर्दभीमुख

  16. अगस्त्य

  17. भृगु

  18. घृत कौशिक

  19. कौडिन्य

  20. उपमन्यु

  21. अत्रि

  22. गालव

  23. अंगिरा

  24. जमदग्नि


  • 1. चांद्रायण, 2. वरतन्तु, 3. मौनस, 4. कण्व, 5. उद्वाह- ये गोत्र सरयूपारीण में अतिरिक्त हैं इस तरह कुल २८ गोत्र मिलते हैं।

  • गर्दभीमुख को अपभ्रंश होने से गर्गमुख या गरमुख भी कहते हैं ! पिंडी के तिवारी गर्दभीमुख शांडिल्य हैं !


गौत्र में प्राप्त वंश
















































गौत्र
प्राप्त वंश
1. गर्ग
शुक्ल,चौबे, तिवारी ,पाण्डेय (इटिया)
2. गौतम
मिश्र, दुबे, पांडे, उपाध्याय
3. शाण्डिल्य
मिश्र, तिवारी, कीलपुर के दीक्षित, प्रतापगढ़ के पाण्डेय
4.गार्ग्य
दुबे(करवरिया)
5. परासर
पांडे, शुक्ल, उपाध्याय
6. भारद्धाज
पांडे, दुबे, पाठक, चौबे, मिश्र, तिवारी, उपाध्याय
7. कश्यप
पांडे, दुबे, पाठक, चौबे, मिश्र, तिवारी, उपाध्याय, शुक्ल, ओझा
8. अत्रि या कृष्णात्रि
दुबे, शुक्ल
9. वत्स
पांडे, दुबे, मिश्र, तिवारी, उपाध्याय, ओझा
10. अगस्त्य
तिवारी
11. कात्यायन
चौबे
12. सांकृत
पांडे, चौबे, तिवारी
13. सावर्ण्य
पांडे, मिश्र
14. भार्गव
तिवारी
15. उपमन्यु
पाठक, ओझा,पाण्डे,दुबे/द्विवेदी
16. वशिष्ठ
मिश्र, तिवारी, चौबे
17. कौडिन्य
मिश्र, शुक्ल,
18. घृतकौशिक
मिश्र
19. कुशिक
चौबे
20. कौशिक
दुबे, मिश्र
21. चांद्रायण
पांडे
22. वरतन्तु
तिवारी

गर्ग (शुक्ल- वंश)


गर्ग ऋषि के तेरह लडके बताये जाते है जिन्हें गर्ग गोत्रीय, पंच प्रवरीय, शुक्ल, बंशज  कहा जाता है जो तेरह गांवों में बिभक्त हों गये थे| गांवों के नाम कुछ इस प्रकार है|


(१) ऊंचहरिया (२)पिछौरा
 (३) भेंडी  (४) बकरूआं  (५) अकोलियाँ  (६) भरवलियाँ  (७) कनइल (८) मोढीफेकरा (९) मल्हीयन (१०) महसों (११) महुलियार (१२) बुद्धहट (१३) मामखोर इसमे चार  गाँव का नाम आता है लखनौरा, मुंजीयड, भांदी, और नौवागाँव| ये सारे गाँव लगभगगोरखपुर, देवरिया और बस्ती में आज भी पाए जाते हैं|मामखोर ग्राम के कुछ ब्राम्हण श्राद्ध (क्रिया-कर्म)का कार्य करने लगे जो बाद में महा ब्राम्हण की श्रेडी में आने लगे 12 गाओ के पंडितो के विरोध के बाद इन परिवारों को अपना गाओ छोड़कर दक्षिण की ओर प्रस्थान करना पड़ा। आज मध्य प्रदेश,कर्नाटक,उड़ीसा आदि जगहों पर उन्नहे फिर इज्जत सम्मान की नजर से देखा जाने लगा आज भी वह ब्राम्हण इनके यहां सादी संबंध नहीं करते जिन्हें इनके इतिहास की जानकारी है


उपगर्ग (शुक्ल-वंश) 


उपगर्ग के छ: गाँव जो गर्ग ऋषि के अनुकरणीय थे कुछ इस प्रकार से हैं|


बरवां (२) चांदां (३) पिछौरां (४) कड़जहीं (५) सेदापार (६) दिक्षापार


यही मूलत: गाँव है जहाँ से शुक्ल बंश का उदय माना जाता है यहीं से लोग अन्यत्र भी जाकर शुक्ल     बंश का उत्थान कर रहें हैं यें सभी सरयूपारीण ब्राह्मण हैं|


गौतम (मिश्र-वंश)


गौतम ऋषि के छ: पुत्र बताये जातें हैं जो इन छ: गांवों के वाशी थे|


(१) चंचाई (२) मधुबनी (३) चंपा (४) चंपारण (५) विडरा (६) भटीयारी(भर्शी)


इन्ही छ: गांवों से गौतम गोत्रीय, त्रिप्रवरीय मिश्र वंश का उदय हुआ है, यहीं से अन्यत्र भी पलायन हुआ है ये सभी सरयूपारीण ब्राह्मण हैं|


उप गौतम (मिश्र-वंश)


उप गौतम यानि गौतम के अनुकारक छ: गाँव इस प्रकार से हैं|


(१)  कालीडीहा (२) बहुडीह (३) वालेडीहा (४) भभयां (५) पतनाड़े  (६) कपीसा


इन गांवों से उप गौतम की उत्पत्ति  मानी जाति है|


गार्ग्य गोत्र (दुबे(करवरिया)-वंश)


गार्ग्य ऋषि के एक ही पुत्र थे जो उच्च कोटि के दुबे वंशज है जो कोरेरी गाँव मे विभक्त हो गए जिन्हे करवरिया की उपाधि मिली।


वत्स गोत्र  ( मिश्र- वंश)


वत्स ऋषि के नौ पुत्र माने जाते हैं जो इन नौ गांवों में निवास करते थे|


(१) गाना (२) पयासी (३) हरियैया (४) नगहरा (५) अघइला (६) सेखुई (७) पीडहरा (८) राढ़ी (९) मकहडा


बताया जाता है की इनके वहा पांति का प्रचलन था अतएव इनको तीन के समकक्ष माना जाता है|


कौशिक गोत्र  (मिश्र-वंश)


तीन गांवों से इनकी उत्पत्ति बताई जाती है जो निम्न है|


(१) धर्मपुरा (२) सोगावरी (३) देशी


बशिष्ट गोत्र (मिश्र-वंश)


इनका निवास भी इन तीन गांवों में बताई जाती है|


(१) बट्टूपुर  मार्जनी (२) बढ़निया (३) खउसी


शांडिल्य गोत्र ( तिवारी,त्रिपाठी -वंश) 


शांडिल्य गोत्र (तिवारी/त्रिपाठी/त्रिवेदी वंश)


शांडिल्य ऋषि के तेरह पुत्र बताये जाते हैं जो इन बाह गांवों से प्रभुत्व रखते हैं|


(१) सांडी (२) सोहगौरा (३) संरयाँ  (४) श्रीजन (५) धतूरा (६) भगराइच (७) बलूआ (८) हरदी (९) झूडीयाँ (१०) उनवलियाँ (११) लोनापार (१२) कटियारी (१३) कुमकुमगईयऻ, लोनापार में लोनाखार, कानापार, छपरा भी समाहित है  


इन्ही बारह गांवों से आज चारों तरफ इनका विकास हुआ है, यें सरयूपारीण ब्राह्मण हैं| इनका गोत्र श्री मुख शांडिल्य- त्रि -प्रवर है, श्री मुख शांडिल्य में घरानों का प्रचलन है जिसमे  राम घराना, कृष्ण घराना, नाथ घराना, मणी घराना है, इन चारों का उदय, सोहगौरा-गोरखपुर से है जहाँ आज भी इन चारों का अस्तित्व कायम है| 


उप शांडिल्य ( तिवारी- त्रिपाठी, वंश)


इनके छ: गाँव बताये जाते हैं जी निम्नवत हैं|


(१) शीशवाँ (२) चौरीहाँ (३) चनरवटा (४) जोजिया (५) ढकरा (६) क़जरवटा !


  • गर्दभीमुख शांडिल्य गोत्र में मुख्यतः पिंडी के तिवारी आते हैं जिनके पूर्वपुरुष ब्रह्मर्षि गर्दभीमुख जी हुए हैं !

भार्गव गोत्र (तिवारी  या त्रिपाठी वंश)


भार्गव ऋषि के चार पुत्र बताये जाते हैं जिसमें  चार गांवों का उल्लेख मिलता है जो इस प्रकार है|


(१) सिंघनजोड़ी (२) सोताचक  (३) चेतियाँ  (४) मदनपुर


 भारद्वाज गोत्र (दुबे वंश)


भारद्वाज ऋषि के चार पुत्र बाये जाते हैं जिनकी उत्पत्ति इन चार गांवों से बताई जाती है|


(१) बड़गईयाँ (२) सरार (३) परहूँआ (४) गरयापार


कन्चनियाँ और लाठीयारी इन दो गांवों में दुबे घराना बताया जाता है जो वास्तव में गौतम मिश्र हैं लेकिन  इनके पिता क्रमश: उठातमनी और शंखमनी गौतम मिश्र थे परन्तु वासी (बस्ती) के राजा  बोधमल ने एक पोखरा खुदवाया जिसमे लट्ठा न चल पाया, राजा के कहने पर दोनों भाई मिल कर लट्ठे को चलाया जिसमे एक ने लट्ठे सोने वाला भाग पकड़ा तो दुसरें ने लाठी वाला भाग पकड़ा जिसमे कन्चनियाँ व लाठियारी का नाम पड़ा, दुबे की गादी होने से ये लोग दुबे कहलाने लगें| 


सरार के दुबे के वहां पांति का प्रचलन रहा है अतएव इनको तीन के समकक्ष माना जाता है|


भारद्वाज गोत्र (उपाध्याय वंश)


इस गोत्र के उपाध्याय वंश के तीन गांव है।ये तीनों गाँवगोरखपुर जिले मे हैं।


(1) खोरीया (2) जागदीशपुुर (3) बसुधा


सावरण गोत्र ( पाण्डेय वंश)


सावरण ऋषि के तीन पुत्र बताये जाते हैं इनके वहां भी पांति का प्रचलन रहा है जिन्हें तीन के समकक्ष माना जाता है जिनके तीन गाँव निम्न हैं| 


(१) इन्द्रपुर (२) दिलीपपुर (३) रकहट (चमरूपट्टी) 


सांकेत गोत्र (मलांव के पाण्डेय वंश)


सांकेत ऋषि के तीन पुत्र इन तीन गांवों से सम्बन्धित बाते जाते हैं|


(१) मलांव (२) नचइयाँ (३) चकसनियाँ


कश्यप गोत्र (त्रिफला के पाण्डेय वंश)


इन तीन गांवों से बताये जाते हैं|


(१) त्रिफला (२) मढ़रियाँ  (३) ढडमढीयाँ 


ओझा वंश 


इन तीन गांवों से बताये जाते हैं|


(१) करइली (२) खैरी (३) निपनियां 


चौबे -चतुर्वेदी, वंश (कश्यप गोत्र)


इनके लिए तीन गांवों का उल्लेख मिलता है|


(१) वंदनडीह (२) बलूआ (३) बेलउजां 


एक गाँव कुसहाँ का उल्लेख बताते है जो शायद उपाध्याय वंश का मालूम पड़ता है| 


नोट:- खास कर लड़कियों की शादी- ब्याह में तीन तेरह का बोध किया और कराया जाता है|  पूर्वजों द्वारा लड़कियों की शादीयाँ गर्ग, गौतम, और शांडिल्य गोत्र में अपने गाँव को छोड़ कर की जाती रहीं हैं|  इटार के पाण्डेय व सरार के दुबे के वहां भी यही क्रम रहा है इन पाँचों में लड़कियों की शादी का आदान-प्रदान होता रहा है, इतर गोत्रो में लड़को की शादियाँ होती रहीं हैं|  आज- कल यह अपवाद साबित होने लग पड़ा है| ये सारे गाँव जो बताये गये हैं वेंगोरखपुर, देवरियां, बस्ती जनपद में खास कर पाए जातें हैं या तो आस-पास के जिले भी हों सकतें हैं, यें सब लोग सरयू पारीण, कूलीन ब्राह्मण की श्रेणी में आते हैं|  .    







-ब्राह्मण

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