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चीन के राजवंशों की राज्यसीमाएँ


पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर चीन में मानव बसाव लगभग साढ़े बाईस लाख (22.5 लाख) साल पुराना है। चीन की सभ्यता विश्व की पुरातनतम सभ्यताओं में से एक है। यह उन गिने-चुने सभ्यताओं में एक है जिन्होनें प्राचीन काल में अपना स्वतंत्र लेखन पद्धति का विकास किया। अन्य सभ्यताओं के नाम हैं - प्राचीन भारत (सिंधु घाटी सभ्यता), मेसोपोटामिया की सभ्यता, मिस्र सभ्यता और माया सभ्यता। चीनी लिपि अब भी चीन, जापान के साथ-साथ आंशिक रूप से कोरिया तथा वियतनाम में प्रयुक्त होती है।




अनुक्रम





  • 1 विहंगम् दृष्य


  • 2 प्रागैतिहासिक काल

    • 2.1 वंशगत शासन



  • 3 प्राचीन चीन


  • 4 मध्यकालीन चीन

    • 4.1 युआन शासन (1279-1368 ई.)


    • 4.2 मिंग-शासन (1368-1644 ई.)


    • 4.3 चिंग वंश (1644-1838 ई.)


    • 4.4 नयी शक्तियों के विरुद्ध चीन में असन्तोष



  • 5 आधुनिक चीन

    • 5.1 चीनी गणराज्य (१९१२-१९४९)


    • 5.2 चीनी जनवादी गणराज्य और चीनी गणतंत्र (१९४९-वर्तमान)



  • 6 इन्हें भी देखें


  • 7 बाहरी कड़ियाँ




विहंगम् दृष्य



  • 221 ईसापूर्व - झाऊ वंश का शासन, सामन्तवादी प्रथा का प्रारंभ,


  • ईसापूर्व 220 से 206 ईसापूर्व - किन वंश ने संगठित चीन की स्थापना की। चीन की विशाल दीवार का निर्माण पूर्ण हुआ।


  • 206 ईसापूर्व से 220 ई - हान वंश ने चीन की सीमा को कोरिया, वियतनाम, मंगोलिया व मध्य एशिया तक बढ़ाया।


  • 1368 ईस्वी - झू यांगझांग ने मंगोलों को पराजित कर मिंग वंश की स्थापना की।


  • 1851 ईस्वी - चीन के अंतिम राजवंश किंग ने यूरोपीय प्रभाव को समाप्त करके देश को नियंत्रण में लिया।


  • 1911 ईस्वी - ताइपिंग विद्रोह हुआ। किंग राजवंश और क्रांतिकारियों के बीच हुए संघर्ष में 2 करोड़ लोग मारे गए। यह चीनी इतिहास का सबसे हिंसक गृहयुद्ध था।


  • 1937 ईस्वी- सन यात-सेन ने किंग वंश के खिलाफ विद्रोह का नेतृत्व किया, चीन गणतंत्र राज्य घोषित।


  • 1939 ईस्वी - जापान ने चीन पर आक्रमण किया। 1945 में इस युद्ध के समाप्त होने तक 1 करोड़ चीनी नागरिक लापता हो चुके थे।


  • 1958 ईस्वी - माओत्से तुंग द्वारा पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की स्थापना हुई, चीन गणतांत्रिक समाजवादी देश बना।


  • 1966 ईस्वी - माओत्से तुंग ने चीन के तीव्र औद्योगीकरण के लिए योजना बनाई। यह तीन वर्ष में ही धराशायी हो गई।


  • 1971 - चीन संयुक्त राष्ट्र संघ के सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य चुना गया।


  • 1978 ईस्वी - माओत्से तुंग द्वारा प्रतिद्वंदियों का सफाया करने के लिए चलायी गई 'सांस्कृतिक क्रांति' में 50,000 लोग मारे गए।


  • 1989 ईस्वी - डेंग जियाओपिंग ने चीन में सुधार और आधुनिकीकरण को प्रेरित किया।


  • 2001 ईस्वी - थ्येन आन मन चौक पर छात्रों द्वारा किए जा रहे विरोध प्रदर्शनों को क्रूरता से कुचला गया।


  • २००८ - बीजिंग को 2008 ओलंपिक मेजबानी का अधिकार मिला।


प्रागैतिहासिक काल


पुरातत्व प्रमाणों से हमें ये ज्ञात होता है कि प्रारम्भिक मुनष्य २२.४ लाख से २,५०,००० वर्ष पूर्व चीन में रहा करते थे। झोऊ कोऊ दियन गुफा से मिले अवशेष ३ से ५.५ लाख वर्ष पुराने हैं और ये उस पेकिंग मानव के हैं जो होमो इरेक्टस था और आग का उपयोग किया करता था।


गुआंगज़ी के लिऊजिआंग क्षेत्र में चीन के आधुनिक मानवों के होने के अवशेष मिले हैं, जिनमें खोपडी का एक भाग भी है जो ६७,००० वर्ष पुराना है। यद्यपि लिऊजिआंग से मिले अवशेषों को लेकर कुछ विवाद है लेकिन जापान के ओकिनावा के मिनातोगावा से मिले एक कंकाल की आयु १८,२५० ± ६५० से १६,६०० ± ३०० वर्ष है। यानी की आधुनिक मानव उस समय से पूर्व चीन पहुँच चुके थे।



वंशगत शासन


चीनी परम्पराओं में ज़िया (Xia) वंश को प्रथम माना जाता है और इसे मिथकीय ही समझा जाता रहा जब तक की हेनान प्रान्त के एर्लीटोउ में पुरातात्विक खुदाइयों में कांस्य युगीन स्थलों के प्रमाण नहीं मिले। पुरातत्वविदों को अब तक की खुदाइयों में नगरीय स्थलों के अवशेष, कांसे के औज़ार और उन स्थानों पर समाधी स्थल मिले है जिन्हें प्राचीन लेखों में ज़िया वंश से सम्बंधित माना जाता है, लेकिन इन अवशेषों की प्रमाणिकता तब तक नहीं हो सकती जब तक की ज़िया काल से कोई लिखित अवशेष नहीं मिलते।




किन वंश के मिटटी के बने हजारों मानवाकार योद्धाओं में से कुछ, २१० ईसापूर्व


दूसरा वंश शांग जो की कुछ कलहकारी था, १८वीं से १२वीं शताब्दी ईसापूर्व पूर्वी चीन की पीली नदी किनारे बसा। पश्चिम में बसे झोऊ साम्राज्य ने आक्रमण के बाद १२वीं से ५वीं शताब्दी ईसापूर्व तक उन पर शासन किया जब तक की उनका एकीकृत नियंत्रण पड़ोस के साम्राज्यों के हमलों से क्षीण नहीं हो गया। कई शक्तिशाली और स्वतंत्र राज्य आपस में लगातार एक-दूसरे पर बसंत और पतझड़ के महीनो में युद्ध करते जिससे झोऊ के राजाओं को कुछ समय मिल जाता।gyan



प्राचीन चीन


प्रथम एकीकृत चीनी राज्य की स्थापना किन वंश द्वारा २२१ ईसा पूर्व में की गई, जब चीनी सम्राट का दरबार स्थापित किया गया और चीनी भाषा का बलपूर्वक मानकीकरण किया गया। यह साम्राज्य अधिक समय तक नहीं टिक पाया क्योंकि कानूनी नीतियों के चलते इनका व्यापक विरोध हुआ।


ईसा पूर्व 220 से 206 ई. तक हान राजवंश के शासकों ने चीन पर राज किया और चीन की संस्कृति पर अपनी अमिट छाप छोड़ी। य़ह प्रभाव अब तक विद्यमान है। हान वंश ने अपने साम्राज्य की सीमाओं को सैन्य अभियानों द्वारा आगे तक फैलाया जो वर्तमान समय के कोरिया, वियतनाम, मोंगोलिया और मध्य एशिया तक फैला था और जो मध्य एशिया में रेशम मार्ग की स्थापना में सहायक हुआ।


हानों के पतन के बाद चीन में फिर से अराजकता का माहौल छा गया और अनेकीकरण के एक और युग का आरम्भ हुआ। स्वतंत्र चीनी राज्यों द्वारा इस काल में जापान से राजनयिक सम्बन्ध स्थापित किए गए जो चीनी लेखन कला को वहां ले गए।


५८० ईसवीं में सुई वंश के शाशन में चीन का एक बार फ़िर एकीकरण हुआ लेकिन सुई वंश कुछ वर्षों तक ही रहा (५९८ से ६१४ ईसवीं) और गोगुर्येओ-सुई युद्धों में हार के बाद सुई वंश का पतन हो गया।
इसके बाद के तेंग और सोंग वंशों के शाशन में चीनी संस्कृति और प्रोद्योगिकी अपने चरम पर पहुंचे। सोंग वंश विश्व इतिहास की पहली ऐसी सरकार थी जिसने कागजी मुद्रा जारी की और पहली ऐसी चीनी नागरिक व्यवस्था थी जिसने स्थायी नौसेना की स्थापना की। १०वीं और ११वीं शताब्दी में चीन की जनसँख्या दुगुनी हो गई। इस वृद्धि का मुख्य कारण था चावल की खेती का मध्य और दक्षिणी चीन तक फैलाव और खाद्य सामग्री का बहुतायत में उत्पादन। उत्तरी सोंग वंश की सीमाओं में ही १० करोड़ लोग रहते थे। सोंग वंश चीन का सांस्कृतिक रूप से स्वर्णिम काल था जब चीन में कला, साहित्य और सामाजिक जीवन में बहुत उन्नति हुई। सातवीं से बारहवीं सदी तक चीन विश्व का सबसे सुसंस्कृत देश बन गया।



मध्यकालीन चीन


1271 में मंगोल सरदार कुबलय खां ने युआन रादवंश की स्थापना की जिसने 1279 तक सोंग वंश को सत्ता से हटाकर अपना अधिपत्य कायम किया। एक किसान ने 1368 में मंगोलों को भगा दिया और मिंग राजवंश की स्थापना की जो 1664 तक चला। मंचू लोगों के द्वारा स्थापित क्विंग राजवंश ने चीन पर 1911 तक राज किया जो चीन का अंतिम वंश था।



युआन शासन (1279-1368 ई.)


तेरहवीं सदी से पश्चिमी देशों ने चीन से सम्बन्ध कायम करने का प्रयास किया। इस समय चीन में युआनों का शासन था। मंगोलों ने इसी काल में चीन पर आक्रमण किया। यूरोप का प्रसिद्ध यात्री तथा व्यापारी मार्कोपोलो अपने पिता तथा चाचा के साथ वेनिस से इसी समय चीन पहुँचा। अल्प काल के लिये उसने कुबलाई खाँ के दरबार में नौकरी भी की। पर उसकी यह सेवा वृत्ति उतनी महत्त्वपूर्ण नहीं है जितनी उसकी यात्रा सम्बन्धी डायरी। इस डायरी में उसने चीन के सम्बन्ध में चर्चा की जिसके फलस्वरूप पश्चिमी देशों का ध्यान चीन की ओर गया। इसी समय इटली शहरों से अनेक यात्री निकट पूर्व की यात्रा करने के सिलसिले में चीन भी आये। इसके अतिरिक्त रोमन कैथोलिकों ने भी चीन से सम्बन्ध कायम करने का प्रयास किया। लेकिन तेरहवीं सदी के उत्तरार्द्ध से लेकर चौदहवीं सदी के उत्तरार्द्ध तक (1279 से 1368 ई.) चीन से सम्पर्क कायम के लिए इन देशों ने जो कुछ भी प्रयास किया वह किसी भी दृष्टिकोण से विशेष महत्त्व का नहीं है। इस समय चीन में प्रविष्ट यात्रियों की संख्या भी अल्प ही थी। पर इतना सही है कि इसी समय से यूरोपियन देशों का ध्यान एशिया के सम्पन्न देशों की ओर गया और वे अगामी सदियों में इन पर छा जाने का प्रयास करने लगे।



मिंग-शासन (1368-1644 ई.)


जब चीन में मिंग-शासन प्रारम्भ हुआ, तब इन यात्रियों ने पुनः चीन की यात्रा करनी प्रारम्भ की। इस समय भी पहले की तरह यात्रा सम्बन्धी अनेक असुविधाएँ थीं। उन्हीं के कारण विदेशी इस काल में भी चीन से घनिष्ठ सम्पर्क कायम नहीं कर सके। इन असुविधाओं में सबसे बड़ी आवागमन सम्बन्धी असुविधा थी। चीन और यूरोपीय देशों के मध्य अभी भी व्यापारिक सम्बन्ध कायम था, लेकिन आवागमन की इन असुविधाओं के चलते अभी भी अनेक व्यापारिक कठिनाइयाँ उठ जाती थीं। यूरोप और एशिया के सारे व्यापारी अपने व्यापारिक जहाजों के साथ पहले लालसागर में उतरकर उसे पार करते थे और इसके बाद मिस्त्र का परिभ्रमण करते हुए वे आकर भूमध्यसागर में उतरते थे। व्यापार करने का अन्य मार्ग भी था। वे इरान की खाड़ी से अपनी व्यापारिक यात्रा प्रारम्भ करते थे। यात्रा के सिलसिले में इरान की खाड़ी से प्रस्थान कर बसरा, बगदाद, मक्का आदि देशों की यात्रा करते हुए एशिया माइनर पहुँचते थे। इस तरह इस आवागमन की असुविधा, के चलते जहाँ एक ओर इन व्यापारियों का आर्थिक सम्बन्ध कतिपय देशों से कायम नहीं हो सकता था, वहाँ दूसरी ओर उन्हें काफी समय व्यर्थ ही गँवाने पड़ते थे। वास्तव में, यही कारण था जिसके चलते इन दिनों पूर्वी देशों के साथ पश्चिमी देश सम्बन्ध कायम नहीं कर सके। इतना ही नहीं, आगे चलकर पन्द्रहवीं सदी के उत्तरार्द्ध में उनके बचे-खुचे व्यापारी मार्ग भी अवरुद्ध हो गये। इसका कारण यह था कि 1453 ई. में तुर्क जाति का एक महान विजेता मुहम्द द्वितीय ने कुस्तुनतुनिया पर अधिकार कर लिया और उनके व्यापारिक मार्ग को बन्द कर दिया।
फिर भी इन असुविधाओं से भी पश्चिमी देशों के यात्रियों तथा व्यापारियों ने संघर्ष किया और कुछ हद तक चीन से सम्बन्ध कायम किया। मंगोल शासक युआन जब तक जीवित रहा तब तक चीन से विदेशियों का कुछ-न-कुछ सम्पर्क अवश्य कायम रहा। लेकिन जैसे ही इसकी मृत्यु हुई वैसे ही ऐसा प्रतीत होने लगा कि अब उनके पारस्परिक सम्बन्ध समाप्त हो जाएँगे। लेकिन मिंग सम्राटों ने इस सम्बन्ध को पुर्नजीवित किया और पश्चिमी देशों की ओर उन्मुख हुए। समय बीतते रहने पर पश्चिमी देशों के व्यापारी पूर्वी देशों की आर्थिक सम्पन्नता (विशेषकर चीन की) विस्मरण नहीं कर पाए थे। मार्कोपोलो की डायरी उनके लिए प्रेरणा-स्रोत ही बन गयी थी फलतः पन्द्रहवीं सदी के अन्त और सोलहवीं सदी के आरम्भ के बीच इन यात्रियों की यात्रा पुनः होने लगी और उनका विस्तार भी होने लगा। इस समय स्पेनिश, डच और रुसी जातियों ने एशिया के पूर्वी तथा उत्तरी क्षेत्रों की ओर सम्बन्ध आगे बढ़ाने में सहयोग दिया। (इन जातियों के आगमन की चर्चा आगे की जाएगी) स्पेन और पुर्तगाल ने प्रेरणा पाकर कोलम्बो नामक प्रसिद्ध यात्री ने भी यात्रा की और सुदूर पूर्व के देशों में पहुँचने का प्रयास किया। 1511 ई. में पुर्तगाली मकाओ (चीन) पहुँचे 1514 ई. में प्रत्यक्ष रूप से चीन की धरती पर आ गए। चीनियों ने इन पुर्तगालियों को असभ्य तथा दुखदायक माना। वे स्थायी रूप से मकाओ में निवास करने लगे। चीन के प्रसिद्ध बन्दरगाह कैण्टन के निकट ही यह मकाओ अवस्थित है जहाँ आजकल भी अच्छी संख्या में पुर्तगाली निवास करते हैं। इस समय अँग्रेज भी चीन आए। जब मिग वंश का शासन समाप्त हो रहा था और मंचू सम्राट शासन प्रारम्भ होने वाला था, ब्रिटेन के अँग्रेज चीन आ धमके। चीन में आगे चलकर वे ही सर्वाधिक प्रभावशाली हुए और चीन के द्वार को पश्चिमी देशों में व्यापार के हेतु खोलने का श्रेय प्राप्त किये।


इन विभिन्न जातियों के आगमन का क्रमिक अध्ययन करना आवश्यक प्रतीत होता है। पूर्वी एशिया में मिंग वंश के शासन-काल में जिस, जाति का सर्वप्रथम आगमन हुआ वह पोर्तुगीज थी। 1498 ई. में वास्कोडिगामा ने अफ्रीका के समुद्र तटीय क्षेत्रों की यात्रा करते हुए भारत-भूमि पर अपने पैरों को रखा पोर्तुगाल यात्री वास्कोडिगामा को इस यात्रा से लाभ हुआ कि पश्चिमी देशों के लोगों, को प्रधानतः तत्काल में पोर्तुगीजों को, पूर्वी देशों तक पहुँचाने के मार्ग का पता लग गया। इसलिए उनका प्रस्थान तथा विस्तार अब अन्य देशों में भी होने लगा। 16 वीं सदी के प्रारम्भ में ही मलक्का पर अधिकार करने के समय वे चीन पहुँच गये। चीन में उनकी पहुँच 1514 ई. में हुई। चीन आते ही वे व्यापारिक कार्यों में संलग्न हो गये। यहाँ के व्यापारी चीन से विलासप्रिय चीजों को खरीदने लगे और पश्चिमी देशों में उनका विक्रय किया जाने लगा जहाँ प्रसाधनों की माँग थी।


लेकिन पोर्तुगीज अपने व्यवहार से चीनियों को प्रसन्न नहीं कर सके। इनके व्यवहार तथा आदतें अच्छी नहीं थी केवल पोर्तगीज ही बुरे नहीं थे, अन्य जातियों की भी ऐसी ही आदतें थीं। स्पेन के लोग जब अमेरिका पहुँचे तब वहाँ की मौलिक जातियों का जीवन भी उनके चलते अत्यन्त कष्टप्रद हो गया। स्पेन के लोगों के विरोध किये जाने पर भी अमेरिका नहीं छोड़ा और वहाँ बस्तियों का निर्माण कर नियमित रूप से बस गये। नियमित रूप से बसते ही वे अमेरिकन लोगों के धर्म, संस्कृति रहन-सहन वगैरह में हस्तक्षेप करने लगे। इतना ही नहीं, बस्तियों के निर्माण के साथ-साथ शनैःशनैः वे उपनिवेश निर्माण की ओर भी उन्मुख हुए इसी सिलसिले में स्पेनवासी चीन भी पहुँचे। पोर्तुगीजों के बाद स्पेनिश ही चीन आये। अमेरिका में इस जाति ने जिस प्रकार की हरकत की थी, उससे चीन के लोग परिचित ही थे। इसलिए चीन की धरती पर उपनिवेश-निर्माण का बीज लिए जैसे ही इस जाति का आगमन हुआ, वैसे ही चीनियों ने इनका विरोध करना प्रारम्भ किया। मिंग सरकार ने तो इस जाति के विरुद्ध एक जोरदार आन्दोलन भी प्रारम्भ कर दिया। यही कारण हुआ कि अमेरिका की तरह चीन में स्पेन वालों की दाल नहीं गल सकी। वे चीन में न तो अपना अस्तित्व ही कायम कर सके और न आकांक्षित बस्तियों का ही निर्माण कर सके। पोर्तुगीजों से भी व्यापारिक सम्बन्ध कायम हो गये थे। इनसे यह सम्बन्ध भी कायम नहीं हो सका। फिर भी स्पेनिश जिद्द के पक्के थे। अमेरिका में जिस प्रकार वे बलपूर्वक रहने लगे थे उसी प्रकार वे चीन में भी रहने का प्रयास किये। इनका एक जत्था चीन के प्रसिद्ध बन्दरगाह कैण्टन में ठहर गया और चीन से व्यापारिक सम्बन्ध कायम करने का प्रयास करने लगा। अन्त में, अठारहवीं सदी के उत्तरार्द्ध (1557 ई.) में अपने कार्य में उन्हें सफलता मिली और मकाओ में अपनी बस्ती का निर्माण कर वे रहने लगे।


इसी समय पश्चिम की अनेक धार्मिक मिशनरियाँ भी चीन आयीं। चीन में इन मिशनरियों ने धर्म का प्रचार करना प्रारम्भ किया। प्रारम्भ में इन मिशनरियों के व्यवहार अच्छे थे, लेकिन बाद में उनकी स्वार्थपूर्ण नीति से चीन के लोग परिचित हुए। इसी समय अँग्रेजों तथा डचों का भी आगमन चीन में हुआ।
लेकिन यहाँ यह बात याद रखनी चाहिए कि मिंगवंश के शासन में चीन का पश्चिमी देशों से दो प्रकार के सम्बन्ध कायम हुए-एक व्यापारिक सम्बन्ध और दूसरा धार्मिक सम्बन्ध। पश्चिम के देश दक्षिण के भूखण्डों का मकाओ तथा कैण्टन से व्यापार करते थे। पश्चिम के व्यापारी चीन में अपने देशों से अनाज सम्बन्धी अनेक पौधे तथा तम्बाकू लाए। तम्बाकू का प्रचार इन लोगों ने काफी किया। इन्हीं के चलते चीन के अधिकांश लोग तम्बाकू का सेवन करने लगे। इसी प्रकार चीन से उनका धार्मिक सम्बन्ध भी कायम था। चीन के भीतरी इलाकों में पश्चिमी देशों की मिशनरियाँ धर्म-प्रचार का कार्य करती थी। मंगोलों के शासन के बाद चीन में ईसाइयों का अन्त हो चला था और उनका प्रभाव घटने लगा था। लेकिन मिंगवंश के शासन के अन्तिम वर्षों में रोमन कैथालिकों ने इन ईसाइयों तथा उनकी मिशनरियों को पुनरुज्जीवित किया। इसी समय ब्रिटेन, फ्रांस वगैरह से फ्रान्सिसकन, आगस्टीनियन, जुसेइट, डोमिनियन आदि अनेक धार्मिक सम्प्रदाय के लोग चीन पहुँच गये। सोलहवीं सदी के प्रारम्भिक वर्षों में ही जेसुइट सम्प्रदाय की प्रधानता चीन में कायम होने लगी। इस सम्प्रदाय का लोकप्रिय प्रचार फ्रान्सिस जेवियर्स था जिससे दक्षिणी तथा पूर्वी एशिया में इस सम्प्रदाय को लोकप्रिय बनाने का अथक और अथक प्रयास किया। इसी प्रचारक ने न इस सम्प्रदाय का प्रचार चीन में भी किया। वस्तुतः जेवियर्स के चलते ही चीन में यह सम्प्रदाय जीवित हो सका। अभी जेविसर्य को अपने कार्य में पूरी सफलता भी नहीं मिली थी कि 1556 ई. में वह संसार से चल बसा। उसकी मृत्यु के पश्चात् उसके कार्य का भार मैथहर रिक्की ने अपने कंधों पर लिया। रिक्की इटली का निवासी था। जेसुइट सम्प्रदाय की लोक प्रियता बढाने के लिए उसने जी जान लगा दी रिक्की की प्रतिभा बहुमुखी थी। वह ज्योतिष तथा गणित का प्रकांड विद्वान था। इतिहासकारों का अनुमान है कि सम्प्रति चीन में ज्योतिष तथा गणित का कोई भी ऐसा विद्वान नहीं था जो रिक्की की समता कर सके। अपने प्रतिभा के चलते ही उसने चीन साहित्य का भी अध्ययन किया। यह चीनी साहित्य रिक्की के लिए पूर्णतः नया विषय था, फिर भी अपने अध्यवसाय तथा प्रतिभा के चलते उसने चीनी साहित्यकारों के बीच काफी प्रतिष्ठा पायी। अपने धर्म का अध्ययन तो उसे था ही, उसने कनफ्यूसियस के धर्म तथा ईसाई धर्म का काफी गहरा अध्ययन किया और दोनों धर्मों की समानता तथा असमानता को एक विद्वान के रूप में रखने का प्रयास किया। चीन की राजधानी पेकिंग में उसने अपना निवास स्थल बनाया। इसी समय फिलीपीन से स्पेनियाई भी चीन आया।



चिंग वंश (1644-1838 ई.)


अबतक चीन में अनेक पश्चिमी जातियाँ आ गयी थीं। 1516 ई. में पोर्तुगीज आ गये थे, 1575 ई. में स्पेनिश आ गये थे; डचों का आगमन 1604 ई. में हुआ था और अँग्रेज 1637 ई. में आये थे। पर इस समय तक अमरीकी तथा रूसी नहीं आ पाये थे। चिंग शासन-काल में इनका आगमन भी चीन में हो गया।


1644 ई. में मिंग वंश का शासन समाप्त हो गया। उत्तर में मंचू नामक विजेताओं ने मिंग को परास्त किया। मंचू मंचूरिया के रहनेवाले थे। सोहलवीं सदी के उत्तरार्द्ध तथा सत्रहवीं सदी के प्रारम्भिक वर्षों में उन्होंने अपने को शक्तिशाली बना लिया और मिंग से मुकडेन अपहृत कर लिया जो उनकी राजधानी भी थी। मुकडेन को वे भी अपनी राजधानी बनाए। चीन में रहनेवाले मंगोलों ने भी इच्छा या अनिच्छा से मंचूओं के शासन को स्वीकार कर लिया। मंचूओं ने चीन की दक्षिणी दीवार तक अपनी राज्य-सीमा बढ़ाने का प्रयास किया। इसी समय जब चीन में मिंग के विरुद्ध असन्तोष की भावना का जन्म हुआ तब मौका पाकर मंचूओ ने पेकिंग पर अपना अधिकार कर लिया और तभी से वे चीन में शासन करने लगे। काँगहसी (1661-1728 ई.) और चीन लुंग (1736-1796 ई.) इस वंश के सर्वाधिक प्रतापी राजा हुए। दीर्घकाल तक मंचूओ ने चीन पर शासन किया।


मंचूकाल में भी पश्चिमी लोगों का आगमन चीन में हुआ। अगर सच पूछा जाय तो यह मानना पड़ेगा कि इसी काल में चीन में पाश्चात्य देशों के प्रभाव की जड़ जमनी प्रारम्भ हुई और इसी काल में विदेशों से चीन का वास्तविक सम्बन्ध कायम हुआ। इस काल में विदेशों से लोग स्थल तथा दोनों मार्गों से आये। समुद्र के रास्ते से पोर्तुगीज, स्पेनिश, फ्रेंच तथा अँग्रेज और कुछ इतालियन तथा जर्मन आये। इसी समय 1784 ई. में अमरीकी व्यापारी भी चीन आये। जमीन के मार्ग से केवल रूस के लोग आये जो चीन में चाँदी का व्यापार करने लगे। विदेशी राज्यों से (विशेषकर रूस से) चीन में इस समय एक सन्धि (Treaty of nerchinsk) भी की। इस सन्धि के द्वारा रूस को पेकिंग में एक मिशन भेजने का अधिकार मिला। पेकिंग में रूस की मिशनरी भी कार्य करने लगी। अमरीका और रूस से यह सम्बन्ध चीन के लिए महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुआ।


चीन में इस समय पुनः विदेशी मिशनरियों का भी आगमन हुआ। अठारहवीं सदी के चीन में इस समय पुनः विदेशी मिशनरियों का भी आगमन हुआ। अठारहवीं सदी के प्रारम्भ तक चीन में ईसाइयों की संख्या 3,00,000 हो गयी थी। 1793 ई. में सर्वप्रथम अँग्रेजों का एक मिशन चीन आया। यह मिशन मेकार्टने के नेतृत्व में चीन आया था। दूसरा मिशन 1816 ई. में पेकिंग आया। इसका नेतृत्वकर्ता लार्ड एमहर्स्ट था। इसी समय राबर्ट मोरिशन के अधीन भी एक मिशन चीन पहुँचा। इस मौके से लाभ उठाकर अब प्रोटेस्टेण्ड मिशनरियों ने चीन में अपना कार्य प्रारम्भ किया। प्रोटेस्टेण्ट लोग चीनियों को हेय दृष्टि से देखते थे और उन्हें असभ्य समझते थे। अँग्रेजों की देखा-देखी डच मिशनरियाँ भी चीन आयीं और 1795 ई. में उनका पहला मिशन चीन पहुँचा। इसी प्रकार 1806 ई. में रूस का एक दूत आया। लेकिन चीन ने उसके प्रति किसी भी प्रकार की सहानुभूति का प्रदर्शन नहीं किया। पेकिंग में फ्रांस के जेमुइट भी पहुँचे और मंचू सम्राट की गौरव-गाथा गाने लगे।


विभिन्न मिशनरियों में सर्वाधिक चतुर तथा प्रभावशालिनी अँग्रेजों की मिशनरियाँ साबित हुईं। चीन में आयी विभिन्न मिशनरियों से अगर अँग्रेज मिशनरी की तुलना की जाय तो यह स्पष्ट हो जाता है कि अठारहवीं सदी के अन्त और उन्नीसवीं सदी के प्रारम्भ में ही अँग्रेजी मिशनरी सभी से आगे निकल गयी। इसका कारण यह था कि अँग्रेज अत्यन्त चतुर तथा कर्मठ थे। अपनी व्यापारिक कुशलता तथा राजनीति चतुरता के चलते उन्होंने अन्य मिशनरियों को प्रतियोगिता में आगे नहीं बढ़ने दिया और भविष्य में चीन में वे अपना प्रभाव कायम करने में समर्थ हुए।



नयी शक्तियों के विरुद्ध चीन में असन्तोष


उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट हो जाता है कि चीन तथा पाश्चात्य देशों के बीच सम्बन्ध कायम हो चला था और उन्नीसवीं सदी तक सम्पूर्ण चीन अनेक विदेशी तथा उनकी मिशनरियाँ दृष्टिगोचर होने लगी थीं। लेकिन वह सम्बन्ध शान्तिपूर्वक आगे न चल सका। चीन की जनता सरकार इन विदेशियों तथा उनकी मिशनरियों से धीरे-धीरे घृणा करने लगी। उनका विचार था, कि पाश्चात्य देशों से सम्पर्क बढ़ाने पर चीन की सभ्यता तथा संस्कृति नष्ट हो सकती है, इसलिए चीन ने पाश्चात्य प्रवृत्तियों का अनुभव किया और उनसे पृथक रहने का प्रयास किया। पाश्चात्य देशों के सम्पर्क में आकर भी उसने अपनी वेश-भूषा, धर्म और रीति-रिवाजों को अंगीकार किया। यही कारण था कि मंचू सरकार खुले रूप से इन पाश्चात्य देशों से पृथक रहने का प्रयास करने लगी इस बात को दृष्टि में रखकर सम्राट कांगहसी ने एक राजकीय विज्ञप्ति निकाली और चीन-प्रवेश से इन जातियों तथा मिशनरियों को वंचित करने का प्रयास किया। इस विज्ञप्ति के पीछे सम्राट् की अपनी भावना तो थी ही, साथ-ही-साथ चीन की जनता को भी सन्तुष्ट करने के लिए उसे यह विज्ञप्ति निकालनी पड़ी। चीन की जनता इन विदेशियों से घृणा करने लगी थी और यह सम्भावना की जाने लगी कि चीन में खून-खराबी भी हो सकती है। विशेषकर विदेशी मिशनरियों से चीन में काफी असन्तोष था। ‘‘मिशनरी के विभिन्न आदेशों के बीच झगड़े, पूर्वजों का आदर करते हुए कुछ धर्म प्रवर्तित लोगों का सम्राट् के हुक्म की मान्यता तथा साथ ही नये धर्म की प्रवृत्ति के प्रति उनके अफसरों के प्रतिनिधित्व के द्वारा उनकी सत्ता की न्यूनता ने धीरे-धीरे भ्रामक विचारों के प्रचारक के वास्तविक चरित्र के प्रति उनकी आँखें खोल दीं।


लेकिन यह याद रखनी चाहिए कि इस विज्ञप्ति के अनुसार चीन में आए हुए विदेशियों को चीन से बाहर नहीं निकाला गया। केवल उन पर या विभिन्न देशों से आये हुए व्यापारियों पर एक प्रकार का नियन्त्रण रखने की बात कही गयी। चीन की मंचू सरकार को यह आशंका हो गयी थी कि अगर इन व्यापारियों को व्यापार करने की अनुमति नहीं दी जाएगी तो वे सम्पूर्ण चीन में फैलकर अशांति फैलाने का प्रयत्न करेंगे। इसलिए इस विज्ञप्ति में यह स्पष्ट कर दिया गया कि ये विदेशी व्यापारी चीन के सभी तटवर्ती बन्दरगाहों से शांतिपूर्वक उचित व्यापार कर सकते हैं। व्यापार करने की अनुमति मिलते ही विदेशियों की प्रसन्नता का पारावार नहीं रहा क्योंकि बड़े सहज ढंग से ही उन्हें यह अनुमति मिल गयी थी। इससे उनका उत्साह और हौसला दोनों बढ़ा। फलतः अर्थ-लोलुपता के चलते इन लोगों ने नाजायज व्यापार भी करना प्रारम्भ किया। वे उन व्यापारिक सुविधाओं का भी दुरुपयोग करने लगे जो उन्हें प्राप्त हुए थे। स्वाभाविक रूप से चीन की सरकार का ध्यान पुनः उनकी ओर आकर्षित हुआ। इसीलिए मंचू वंश के दूसरे सम्राट् चिएन लुग ने 1757 ई. में एक दूसरी विज्ञप्ति निकाली जिसके चलते वैदेशिक व्यापार को चीन में सीमित कर दिया गया और व्यापारियों पर अनेक प्रकार के प्रतिबन्ध लगाये गये। इस विज्ञप्ति के अनुसार इन विदेशी व्यापारियों को दक्षिणी चीन के केवल एक बन्दरगाह कैण्टन से व्यापार करने की अनुमति मिली। इसके अतिरिक्त चीन में एक व्यापारिक दल का संगठन किया गया जिसे ‘को-हंग’ कहा गया। इस दल के परामर्श तथा देख-रेख में ही विदेशी व्यापारी चीन से व्यापार कर सकते थे। इस तरह अठारहवीं सदी के उत्तरार्द्ध में उन व्यापारियों की चाल पर चीन की सरकार ने एक पैनी दृष्टि रखी और यह स्पष्ट कर दिया कि वे व्यापारिक मामलों के लिए किसी अन्य बन्दरगाह का दौरा नहीं कर सकते हैं। पर इस विज्ञप्ति का कोई विशेष असर विदेशी व्यापारियों पर नहीं पड़ा। व्यापार के साथ-साथ चीन की राजनीति पर भी इनका हस्तक्षेप होना प्रारम्भ हो गया और ईसाई मिशनरियों के कर्तृत्व तो और भी अधिक बुरे होने लगे। कैण्टन से व्यापार करते-करते वे चीन के अन्य बन्दरगाहों से भी व्यापार करने लगे। चीनियों को अफीम का सेवन कराकर उनकी आदतें बुरी बनाने लगे। अफीम खाने की आदत पड़ जाने से व्यापारी अफीम की बिक्री द्वारा आर्थिक लाभ प्राप्त करना चाहते थे। जब अफीम के बुरे परिणामों को चीन की सरकार देखने लगी और इस व्यापार पर रोक लगायी, तब विदेशी व्यापारी चीन के आफिसरों को घूस देकर अपनी ओर मिलाने लगे और चोरी छिपे यह व्यापार चलता रहा। इस कार्य में इंगलैण्ड के अँग्रेज अत्यन्त पटु थे। अफीम के चलते चीन को दो प्रकार के नुकसान होने प्रारम्भ हो गये।
एक तो अफीम की बिक्री बढ़ जाने से अँग्रेजों को फायदा हुआ, लेकिन चीन को आर्थिक क्षति उठानी पड़ी। दूसरा यह कि चीन की जनता का नैतिक धरातल नीचे गिरने लगे। फलतः सरकार ने पूर्ण कठोरता के साथ अफीम के व्यापार पर नियन्त्रण रखने का प्रयास किया जिसके फलस्वरूप चीन तथा ब्रिटेन में अफीम युद्ध हुआ। इस युद्ध में चीन सफल नहीं हो सका क्योंकि उसके दुश्मनों के पास शक्तिशाली और केन्द्रित सरकार थी और चीन का शासन कमजोर तथा विकेन्द्रित था। अतः इन शत्रुओं का सामना करने के लिए चीन शासन कमजोर तथा विकेन्द्रित था। अतः इन शत्रुओं का सामना करने के लिए चीन कतई तैयार नहीं था।’’


इस तरह अनेक वर्षों के बाद उन्नीसवीं सदी तक चीन के साथ विदेशियों का सम्बन्ध कायम हुआ। इस सम्बन्ध के परिणाम चीनियों के लिए नितान्त बुरे ही सिद्ध हुए। यह सही है कि इन्हीं विदेशियों के चलते चीन में राष्ट्रीयता की भावना आयी, लेकिन जबतक विदेशियों की दाल गलती रही वे चीन में अपने साम्राज्यवाद के विकास का प्रत्यन करते रहे। भारतीय इतिहासकार श्री पन्निकर का मत है कि पाश्चात्य देशों के सम्पर्क से चीन को लाभ से अधिक क्षति उठानी पड़ी और प्रथम विश्व-युद्ध के पाँच-छः वर्षों के पश्चात् तक चीन का गौरव धूल-धूसरित होता रहा, राजनीतिक अखण्डता टूटती रही और प्रशासनिक दृढ़ता लायी नहीं जा सकी।



आधुनिक चीन


युद्ध कला में मध्य एशियाई देशों से आगे निकल जाने के कारण चीन ने मध्य एशिया पर अपना प्रभुत्व जमा लिया, पर साथ ही साथ वह यूरोपीय शक्तियों के समक्ष कमजोर पड़ने लगा। चीन शेष विश्व के प्रति सतर्क हुआ और उसने यूरोपीय देशों के साथ व्यापार का रास्ता खोल दिया। ब्रिटिश भारत तथा जापान के साथ हुए युद्धों तथा गृहयुद्धो ने क्विंग राजवंश को कमजोर कर डाला। अंततः 1912 में चीन में गणतंत्र की स्थापना हुई।



चीनी गणराज्य (१९१२-१९४९)


१ जनवरी १९१२ के दिन चीनी गणराज्य की स्थापना हुई और किंग वंश के पतन का आरम्भ भी। के॰एम॰टी या राष्ट्रवादी दल के सुन यात-सेन को अनंतिम अध्यक्ष चुना गया लेकिन बाद में अध्यक्षता युआन शिकाई को सौंपी गयी जिसने ये सुनिश्चित किया की क्रांति के लिए पूरी बेईयांग सेना किंग साम्राज्य का साथ नहीं देगी। १९१५ में युआन ने स्वयं को चीन का सम्राट घोषित कर दिया लेकिन बाद में उसे राज्य को त्यागने और गणराज्य को वापस सौंपने के लिए बाधित किया गया और उसने स्वयं भी ये अनुभव किया की ये अलोकप्रिय कदम है, न केवल लोगों के लिए बल्कि स्वयं उसकी बेईयांग सेना और सेनाअध्यक्षों के लिए भी।


१९१६ में युआन शिकाई की मृत्यु के बाद चीन राजनेतिक रूप से खंडित हो गया, यद्यपि अन्तराष्ट्रीय समुदाय द्वारा मान्यताप्राप्त लेकिन वास्तविक रूप से शक्तिहीन सरकार बीजिंग में स्थापित थी। सिपहसालारों का उनके द्वारा नियंत्रित क्षेत्रों पर वास्तविक अधिकार था। १९२० के अंतिम वर्षों में चियांग काई-शेक द्वारा कुओमिन्तांग (राजनेतिक दल) की स्थापना की गयी जिसने चीन को पुनः एकीकृत किया और राष्ट्र की राजधानी नानकिंग (वर्तमान नानजिंग) घोषित की और एक "राजनीतिक संरक्षण" का कार्यान्वयन किया जो सुन यात-सेन द्बारा चीन के राजनेतिक विकास के लिए निधारित किये गए कार्यक्रम का मध्यवर्ती स्टार था जिसका उद्देश्य चीन को आधुनिक और लोकतांत्रिक राष्ट्र बनाना था। प्रभावी रूप से, "राजनीतिक संरक्षण" का अर्थ कुओमिन्तांग द्वारा एक-दलीय शाशन था।


१९३७-१९४५ के चीन-जापान युद्ध के कारण राष्ट्रवादियों और साम्यवादियों के बीच एक असहज गठबंधन हुआ और साथ ही १ करोड़ चीनी नागरिक भी मारे गए। १९४५ में जापान के समर्पण के साथ, चीन विजयी राष्ट्र के रूप में तो उभरा लेकिन वित्तीय रूप से उसकी स्तिथि बिगड़ गयी। राष्ट्रवादियों और साम्यवादियों के बीच जारी अविश्वास के कारण चीनी गृह युद्ध की नींव पड़ी। १९४७ में, संवैधानिक शासन स्थापित किया गया था, लेकिन आर॰ओ॰सी संविधान के बहुत से प्रावधानों को चल रहे गृह युद्ध के कारण मुख्य भूमि पर कभी भी लागू नहीं किया गया।



चीनी जनवादी गणराज्य और चीनी गणतंत्र (१९४९-वर्तमान)


चीन के साम्यवादी दल (सीसीपी) ने चीनी गृह युद्ध में अपनी जीत के बाद माओ तुंग के नेतृत्व में चीनी मुख्यभूमि के अधिकांश भाग पर नियंत्रण कर लिया। १ अक्टूबर, १९४९ को उन्होंने एक समाजवादी राज्य के रूप में "लोकतान्त्रिक तानाशाही" की स्थापना की जिसमे केवल सीसीपी ही वैध राजनीतिक दल था। चिआंग कई-शेक के नेतृत्व वाली चीनी सरकार की केंद्रीय सरकार को ताईवान में आश्रय लेने के लिए विवश किया गया जिसपर उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध में अधिकार किया था और वे चीनी गणराज्य (ताइवान) की सरकार को वहीँ ले गए। सैन्य संघर्ष १९५० में समाप्त हो गए लेकिन किसी भी शान्ति संधि पर हस्ताक्षर नहीं किया गए।


१९७० के अंतिम वर्षों के बाद से, चीन गणराज्य ने अपने नियंत्रण के क्षेत्रों में पूर्ण, बहु-दलीय, प्रतिनिधियात्मक लोकतंत्र लागू किया जैसे ताइवान, बहुत से छोटे द्वीपों जैसे कुइमोय और मात्सु में। समाज के सभी क्षेत्रों द्वारा आज, चीनी गणराज्य (ताइवान) में सक्रिय राजनीतिक भागीदारी है। चीनी गणराज्य (ताइवान) की राजनीति में मुख्य विपाटन ताइवान की औपचारिक स्वतंत्रता बनाम चीन की मुख्य भूमि के साथ अंतिम राजनीतिक एकीकरण प्रमुख मुद्दा है।


चीनी गृह युद्ध के बाद, मुख्य भूमि चीन विघटनकारी सामाजिक आंदोलनों के दौर से गुजरा जिसका आरम्भ १९५० में "ग्रेट लीप फॉरवर्ड" से हुई और जो १९५० के दशक की "सांस्कृतिक क्रांति" के साथ जारी रही जिसने चीन की शिक्षा व्यवस्था और अर्थव्यवस्था का बिखराव कर दिया। माओ ज़ेदोंग और झोउ एनलाई जैसे अपनी पहली पीढ़ी के साम्यवादी दल के नेताओं की मृत्यु के साथ ही, चीनी जनवादी गणराज्य ने देंग जियाओपिंग की वकालत में राजनीतिक और आर्थिक सुधारों की एक श्रृंखला आरम्भ की जिसने अंतत: १९९० के दशक में चीनी मुख्य भूमि के तीव्र आर्थिक विकास की नींव रखी।


१९७८ के बाद के सुधारों के कारण समाज के कई क्षेत्रों पर नियंत्रण में कुछ ढील दी गयी है। बहरहाल, ची ज ग (परक) सरकार का अभी भी राजनीति पर लगभग पूर्ण नियंत्रण है और यह लगातार उन कारणों के उन्मूलन प्रयासों में लगी रहती है जिसे ये देश के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्थिरता के लिए खतरे के रूप देखती है। उदाहरण के लिए आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई, राजनीतिक विरोधियों और पत्रकारों को कारावास, प्रेस विनियमन की निगरानी, धर्म का विनियमन और स्वतंत्रता/पृथकतावादी आंदोलनों को कुचलना। १९८९ में त्यानआनमेन चौक में छात्र विरोध समाप्त करने के लिए चीन की सेना ने मार्शल लॉ के १५ दिन के बाद हिंसक रूप से कुचल दिया। १९९७ में ब्रिटेन द्वारा हांगकांग के चीन को वापस दे दिया गया और १९९९ में पुर्तगाल द्वारा मकाउ।



इन्हें भी देखें


  • चीन के राजवंश

  • प्राचीन चीन

  • मध्यकालीन चीन

  • आधुनिक चीन


बाहरी कड़ियाँ



  • चीन का सम्पूर्ण इतिहास (चीन का अन्तरराष्ट्रीय रेडियो)


  • चीन का इतिहास (गूगल पुस्तक ; लेखक - पो सी ई जीनी)


-चीन, चीन का इतिहास, देशानुसार इतिहास

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